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	<title>Poetry by Baba Ji</title>
	<link>http://bharatbhakti.org/wordpress/poetry</link>
	<description>Bharat Bhakti Sansthan (India) / Baba Mourya Project Inc. USA</description>
	<pubDate>Wed, 15 Jun 2011 20:03:25 +0000</pubDate>
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		<title>फिर मत कहना कवियों ने न अपना धर्म निभाया था।</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Jun 2007 01:08:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;
फिर मत कहना कवियों ने न अपना धर्म निभाया था।
हम बोलेंगे गीत ये हमने बार बार दोहराया था।
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हमने खुद अपनों को नीचा कहकर के ठुकराया है।
हार के रूप में हमने अपनी गलती का फल पाया है॥
गैरों का ये दल न किसी भी आसमान से आया है।
पाप हमारा बनकर के आतंक हमीं पर छाया है॥
भूल पुरानी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<strong>फिर मत कहना कवियों ने न अपना धर्म निभाया था।<br />
हम बोलेंगे गीत ये हमने बार बार दोहराया था।</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
हमने खुद अपनों को नीचा कहकर के ठुकराया है।<br />
हार के रूप में हमने अपनी गलती का फल पाया है॥<br />
गैरों का ये दल न किसी भी आसमान से आया है।<br />
पाप हमारा बनकर के आतंक हमीं पर छाया है॥<br />
भूल पुरानी दुःखदायी है अब तो चलो सुधार करें।<br />
बिछड़ गये जो भाई उनको गले लगाकर प्यार करें॥<br />
वरना ये कांसी माया अंग्रेजों से भी भारी होंगे,<br />
फूट डालकर जिनने अपना देश गुलाम बनाया था।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">हस्ती न मिट सकी हमारी दुश्मन था जग सदियों से।<br />
गाकर मत भूलो जाकर पूछो पंजाबी नदियों से॥<br />
कहॉ गया कंधार कहॉ ननकाना साहिब प्यारा है।<br />
दूर हुआ गंगा से उसका सप्त सिंधु जल न्यारा है।<br />
कंश्मीर कैलाश गया और हस्ती मिटती आई है।<br />
दिग्विजयी भारत की सीमा सदा सिमटत्ी आई है॥<br />
कहॉ गया वो तक्षशिला का गुरूकुल जिसने दुनियॉ को,<br />
ज्ञान कला विज्ञान नीति का पहला पाठ पढ़ाया था।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">दुश्मन की ताकत से ज्यादा ताकत सदा हमारी थी।<br />
चंद दुश्मनों फिर भी कर ली हम पर सरदारी थी॥<br />
गांधार पारस तक अपनी विजय ध्वजा फहराती थी।<br />
दूर दूर तक भारत के बेटों की फैली थाती थी॥<br />
कहॉ गया वो सिंध बंग कैलाश जो जग से न्यारा था।<br />
कटा फटा है देश हमारा जो वीरों का प्यारा था॥<br />
नहीं रहा भू भाग के जिस पर बड़े गर्व से पुरखों ने,<br />
हिन्दु भूमि कहकर के अपना भगवा ध्वज लहराया था।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">कदम कदम पर देशभक्ति की जो मिसाल दी जाती थी।<br />
जापानी वीरों की गाथायें दोहराई जाती थी॥<br />
जिसने एटम बम का मद तोड़ा है अपने सीने से।<br />
देश बनाया जिस पीढ़ी ने अपने खून पसीने से॥<br />
उस पीढ़ी की नई जवानी काम छोड़कर नाच रही।<br />
चार्वाक के आदर्शों को कर्मों व्दारा बॉच रही॥<br />
इतिहासों में देखो कि दुश्मन ने घुसपैठी बनकर के<br />
हर राजा को राग रंग में फॅसा कैद करवाया था।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">हम ईश्वर को बॉध रहे अपने घर की दीवारों में।<br />
खोट कहीं न कहीं मगर है भक्ति भरे विचारों में॥<br />
हम अपने ठाकुर को सोने चॉदी से मढ़वाते हैं।<br />
ठाकुर का है नाम प्रतिष्ठा हम अपनी बढ़वाते है॥<br />
ठाकुर को अपनाते अपनाते ठाकुर की राह नहीं।<br />
दुनियॉ जिस ठाकुर की उस ठाकुर की है पर्वाह नहीं॥<br />
सचमुच अगर तुम्हारे ठाकुर दुनियॉ भर के ठाकुर है तो<br />
गले लगाओ उन्हें जिन्हें ठाकुर ने गले लगाया था<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">साथ चलें और साथ में बोले वेद वचन ये प्यारा है।<br />
व्यष्टि नहीं समष्टि में हरि ने खुद को विस्तारा है॥<br />
जाओ मंदिर में सत्संग करो सबके संग भजन करो।<br />
अपने अपने घर में छोटे मंदिर का मत सृजन करो॥<br />
मुस्लिम को देखो कुछ भी हो पर मस्जिद में जाता है।<br />
अपनी अपनी छोटी मस्जिद घर में नहीं बनाता है॥<br />
इसीलिये वे एक और हम टुकडो़ में हैं बटे हुए,<br />
सोचो कि संतों ने क्यूं मंदिर का चलन चलाया था।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">स्वर्ग मिलेगा इसी वास्ते हमने हरदम दान किया ।<br />
कहा गया उसको न समझा आंख मींच कर मान लिया ।<br />
मंदिर ऊंचे बनवाकर के स्वर्ण कलश चढ़वाये थे ।<br />
फर्शों में हीरे मोती माणिक पन्ना जड़वाये थे ।<br />
आंख मींच कर सोचा हमने पाप हमारे छूट गये ।<br />
आंख खुली तो देखा उनको चंद विधर्मी लूट गये ।<br />
राम कीन्ह चाहै सोइ होई कहकर के चुप बैठ गये ।<br />
अपनी कायरता की कबरों में जाकर हम लेट गये ॥<br />
टूटे सब देवालय जिनको श्रद्धा से बनवाया था ।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
<p align="center">हमने दुर्गा सप्तशती को घर्म ग्रंथ स्वीकार किया ।<br />
तिल जौ की आहूति देकर मंत्रों का उच्चार किया ।<br />
महिसासुर को मारा मॉ ने कथा खूब दोहराई है ।<br />
चंड मुंड संहारक मां दुर्गा की महिमा गाई है ।<br />
किंतु कथा के अंदर का पहचाना हमने मर्म नहीं ।<br />
पूजा अर्चन मंत्रोच्चार हमने माना धर्म यही ।<br />
फूट में पड़के देव सभी जब जाकर फंसे विपक्ति में<br />
एक भाव तब हुआ सहायक शक्ति की उत्पत्ति में ।<br />
सदा संगठन में शक्ति और फूट में दुर्गति होती है,<br />
सबकी शक्ति ने मिलकर के दुर्गा रूप बनाया था ।<br />
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।<br />
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।</p>
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