फिर मत कहना कवियों ने न अपना धर्म निभाया था।
June 7th, 2007—————————————————————————–
फिर मत कहना कवियों ने न अपना धर्म निभाया था।
हम बोलेंगे गीत ये हमने बार बार दोहराया था।
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हमने खुद अपनों को नीचा कहकर के ठुकराया है।
हार के रूप में हमने अपनी गलती का फल पाया है॥
गैरों का ये दल न किसी भी आसमान से आया है।
पाप हमारा बनकर के आतंक हमीं पर छाया है॥
भूल पुरानी दुःखदायी है अब तो चलो सुधार करें।
बिछड़ गये जो भाई उनको गले लगाकर प्यार करें॥
वरना ये कांसी माया अंग्रेजों से भी भारी होंगे,
फूट डालकर जिनने अपना देश गुलाम बनाया था।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
हस्ती न मिट सकी हमारी दुश्मन था जग सदियों से।
गाकर मत भूलो जाकर पूछो पंजाबी नदियों से॥
कहॉ गया कंधार कहॉ ननकाना साहिब प्यारा है।
दूर हुआ गंगा से उसका सप्त सिंधु जल न्यारा है।
कंश्मीर कैलाश गया और हस्ती मिटती आई है।
दिग्विजयी भारत की सीमा सदा सिमटत्ी आई है॥
कहॉ गया वो तक्षशिला का गुरूकुल जिसने दुनियॉ को,
ज्ञान कला विज्ञान नीति का पहला पाठ पढ़ाया था।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
दुश्मन की ताकत से ज्यादा ताकत सदा हमारी थी।
चंद दुश्मनों फिर भी कर ली हम पर सरदारी थी॥
गांधार पारस तक अपनी विजय ध्वजा फहराती थी।
दूर दूर तक भारत के बेटों की फैली थाती थी॥
कहॉ गया वो सिंध बंग कैलाश जो जग से न्यारा था।
कटा फटा है देश हमारा जो वीरों का प्यारा था॥
नहीं रहा भू भाग के जिस पर बड़े गर्व से पुरखों ने,
हिन्दु भूमि कहकर के अपना भगवा ध्वज लहराया था।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
कदम कदम पर देशभक्ति की जो मिसाल दी जाती थी।
जापानी वीरों की गाथायें दोहराई जाती थी॥
जिसने एटम बम का मद तोड़ा है अपने सीने से।
देश बनाया जिस पीढ़ी ने अपने खून पसीने से॥
उस पीढ़ी की नई जवानी काम छोड़कर नाच रही।
चार्वाक के आदर्शों को कर्मों व्दारा बॉच रही॥
इतिहासों में देखो कि दुश्मन ने घुसपैठी बनकर के
हर राजा को राग रंग में फॅसा कैद करवाया था।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
हम ईश्वर को बॉध रहे अपने घर की दीवारों में।
खोट कहीं न कहीं मगर है भक्ति भरे विचारों में॥
हम अपने ठाकुर को सोने चॉदी से मढ़वाते हैं।
ठाकुर का है नाम प्रतिष्ठा हम अपनी बढ़वाते है॥
ठाकुर को अपनाते अपनाते ठाकुर की राह नहीं।
दुनियॉ जिस ठाकुर की उस ठाकुर की है पर्वाह नहीं॥
सचमुच अगर तुम्हारे ठाकुर दुनियॉ भर के ठाकुर है तो
गले लगाओ उन्हें जिन्हें ठाकुर ने गले लगाया था
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
साथ चलें और साथ में बोले वेद वचन ये प्यारा है।
व्यष्टि नहीं समष्टि में हरि ने खुद को विस्तारा है॥
जाओ मंदिर में सत्संग करो सबके संग भजन करो।
अपने अपने घर में छोटे मंदिर का मत सृजन करो॥
मुस्लिम को देखो कुछ भी हो पर मस्जिद में जाता है।
अपनी अपनी छोटी मस्जिद घर में नहीं बनाता है॥
इसीलिये वे एक और हम टुकडो़ में हैं बटे हुए,
सोचो कि संतों ने क्यूं मंदिर का चलन चलाया था।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
स्वर्ग मिलेगा इसी वास्ते हमने हरदम दान किया ।
कहा गया उसको न समझा आंख मींच कर मान लिया ।
मंदिर ऊंचे बनवाकर के स्वर्ण कलश चढ़वाये थे ।
फर्शों में हीरे मोती माणिक पन्ना जड़वाये थे ।
आंख मींच कर सोचा हमने पाप हमारे छूट गये ।
आंख खुली तो देखा उनको चंद विधर्मी लूट गये ।
राम कीन्ह चाहै सोइ होई कहकर के चुप बैठ गये ।
अपनी कायरता की कबरों में जाकर हम लेट गये ॥
टूटे सब देवालय जिनको श्रद्धा से बनवाया था ।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।
हमने दुर्गा सप्तशती को घर्म ग्रंथ स्वीकार किया ।
तिल जौ की आहूति देकर मंत्रों का उच्चार किया ।
महिसासुर को मारा मॉ ने कथा खूब दोहराई है ।
चंड मुंड संहारक मां दुर्गा की महिमा गाई है ।
किंतु कथा के अंदर का पहचाना हमने मर्म नहीं ।
पूजा अर्चन मंत्रोच्चार हमने माना धर्म यही ।
फूट में पड़के देव सभी जब जाकर फंसे विपक्ति में
एक भाव तब हुआ सहायक शक्ति की उत्पत्ति में ।
सदा संगठन में शक्ति और फूट में दुर्गति होती है,
सबकी शक्ति ने मिलकर के दुर्गा रूप बनाया था ।
में बोलूंगा गीत ये मैंने बार बार दोहराया था ।
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था ।

October 24th, 2007 at 3:07 am
आप सभी को जय श्री राम
तुम मत कहना कवियों ने प अपना घर्म निभाया था अच्छा रचना है मन मानस को झकझोर देता है
कवियों ने तो अपना धर्म नीभा दीया लेकिन यहा कि जनता क्यो नही अपना धर्म नीभा रही है कब इनमे जाग्रती आयेगा
कबा इस देश को महान बनायेगे
December 25th, 2008 at 11:27 am
baba g ! pranam!
ek bhi geet nahi baj raha hain. thik kijye. VANDE MATRAM.aapka
anil singh
aurangabad bihar
February 10th, 2009 at 10:47 am
Baba jee
mai aapne naam ke saath ved rishee kacheevan ka naam jodata hau kiya yah ucheet hai. mairaa marg darshan kare
Aapka Darshana Abhilashee
Hardayal Kushwaha
B-59/C Shivpark Khanpur New Delhi-62
9891485947/9911197344
November 15th, 2009 at 3:48 am
APKI KAVITANYE DIL KO JHAKJHOR DETI HAI
RASTRA KI ARADHANA BHAGWAN KI ARADHANA HAI.
NAWAL K AGRAWAL
OM TRADERS
KOTPUTKI-303108
DIST-JAIPUR (RAJASTHAN)
December 17th, 2009 at 2:20 am
Dear,
Babaji ,
I was in jalgaon event programme,i saw & listen you there I like all you poems song style evrething as i am big fan of yours & hope for your future event should held in jalgaon or near by cities please let me know where your events are going on so i can give my contribution to your events .
regards
sagar kotecha