भारत भक्ति उद्घोष, मासिक पत्रिका

June 8th, 2011

Bharat Bhakti Udghosh

“Bharat Bhakti Udgosh” is a monthly Magazine
published by Bharat Bhakti Sansthan, Mumbai.
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भारत माता की आरती, कार्यक्रम परिचय …

May 15th, 2006

” दो शब्दों की दिव्य चेतना राष्ट्रभाव संचारती।
वन्देमातरम् गाकर कर लो भारत माँ की आरती “

विश्व में एकमात्र देश है भारत, जिसे वहॉं के निवासियों ने मॉं कहकर वन्दना की। जहॉं देशभक्ति को धर्म मान कर अपनाया जाता रहा। राष्ट्रभाव को मॉं-बेटे के पावन नाते से जोड़ दिया। वैदिक काल के भूमिसूक्त को काव्यात्मक रुप मिला बंकिमचंद की लेखनी द्वारा वन्दे मातरम के रूप में। भारत की शस्यश्यामला भूमि प्रतिष्ठित हुई दशप्रहरणधारिणी दुर्गा के रूप में……एक शब्द आंदोलन बन गया। देश पर सर्वस्व चढ़ाने वालों की प्रेरणा स्त्रोत बन गया।

इसी गीत को नवीन आयामों के साथ मंचीय रूप दिया गया है इस कार्यक्रम में। अपनी विविध कलाओं के सूत्र में राष्ट्रीय विचारों तथा वर्तमान परिस्थितियों को पिरोकर यह मंचीय कार्यक्रम बाबा की अभिनव प्रस्तुति है। चित्रकारी, गीत-संगीत, और काव्य के विविध रंगों से रंगा यह कार्यक्रम दुनियॉ में अपने ढंग का एकमात्र प्रयोग है। जो महानगरों से लेकर छोटे-छोटे गॉंवों तक समान रूप से देखा और सराहा गया है। हर वर्ग के दर्शक इस कार्यक्रम में श्रोता बाबा के शब्दों की धारा में बहने लगते हैं। जिस दिन कार्यक्रम आयोजित होता है स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का सा माहौल निर्मित हो जाता है।

यह कार्यक्रम कोरी बौद्धिकता, कोरी आदर्शवादिता या मनोरंजन नहीं, व्यवहारिक देशभक्ति जागरण का एक अभियान बन चुका है। हर कला की अपनी विशेषता तो होती है पर सीमायें भी होती है। इसलिये विभिन्न कलाओं को जोड़ कर सीमाओं का विस्तार करके यह कार्यक्रम राष्ट्रदेव के यज्ञ का माध्यम बन रहा है। इस कार्यक्रम में हास्य व्यंग्य एवं वीर रस की कविताओं, राष्ट्रगौरव के विषयों, भक्ति संगीत तथा देशभक्ति गीतों के साथ ही साथ देश के महान सपूत महापुरूषों का चित्रांकन बड़े कैनवास पर किया जाता है।

भारत माँ की आरती

June 15th, 2005

Listen Bharat Mata Aarti   Download

दो शब्दों की दिव्य चेतना, राष्ट्रभाव संचारती।
वन्देमातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

भागीरथ बंकिम लाये थे, भू पर ये गंगाधारा।
आजादी के दीवानों का, तेज भरा था ये नारा॥
सिद्ध किया इस महामंत्रा को, अरबिन्दो से योगी ने
हर इक कष्ट सहे वीरों ने, किन्तु मंत्रा ये उच्चारा॥
अद्भुत गरिमा महामंत्रा की, दास्यवृति से तारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

सुजला-सुफला धरती प्यारी ऋषि-मुनियों की दिव्यधरा।
जिसके कण कण में बल विक्रम, पौरुषता का तेज भरा॥
ज्ञान और विज्ञान की पावन, गंगा अविरल बहती है,
सारे जग को भ्रातृभाव की, मिली यहीं से परम्परा॥
कमला,अमला सरला,अतुला, वरदा सुखदा भारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

उन्नत शीश हिमालय जिसकी, शुभ्र ज्योति दिखलाता है।
मलय पवन जिसके ऑंगन की बगिया को महकाता है॥
हिममंडित कैलाश शिखर से, गर्जन करते सागर तक
तेरी सुषमा अतुलित सब जग, श्रध्दासुमन चढाता है॥
सागर की लहरें माँ तेरे, पावन चरण पखारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

कोटि-कोटि भुज खरकर, वालों से सीमायें रक्षित हों।
अन्न-धान के रसमय बादल, से सब भूमि सरसित हो॥
बहुबलधारिणी, रिपुदलवारिणी, जगततारिणी जगमाता
दुर्गारुपिणी तेरे बेटे, शोक रहित हों हर्षित हों॥
संतानों के हित में माँ, तू रुप चंडी का धारती।
वन्दे मातरम गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

भारत माँ के सब बेटे हैं, सबको माँ का प्यार मिले।
एक रहे कानून व्यवस्था, सबको सम अधिकार मिले॥
जाति भाषा पंथ भेद तो, रूप रंग खुशबू भाई
इन बातों को लेकर ना, इस धरती पर हथियार चले॥
समरस भावों से भारत माँ, पुत्रों तुम्हें निहारती।
वन्दे मातरम् गाकर लो, भारत माँ की आरती॥

रामकृष्ण शिव की धरती, भक्तों क्यों बोलो दुर्बल है ?
गंगा, कावेरी, विंध्याचल, और हिमालय घायल है॥
हीरे मोती देने वाली, धरती क्यों मजबूर हुई?
माँ के पैरों में क्यों डंकल, की काली सी पायल है ?
संकट में है माता पुत्रों, ममता तुम्हें पुकारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

शांति व्यवस्था के नामों पर, खूनी से समझौते हैं।
आतंकित हैं दसों दिशायें, नर नारी सब रोते हैं॥
जाति भाषा मजहबवादी, खाद डालकर ऐ भैया
ये झूठे सेक्यूलर नेता, फसल वोट की बोते हैं॥
इनके कारण पड़ी भँवर में, जो सब जग को तारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

एक़े छप्पन की आवाजें, गूँज रही है गलियों में।
देश की भक्ति फॅंसी हुई है, स्वार्थसिध्दि की बलियों में॥
चीर खींच कर दु:शासन ने, कई द्रौपदी नग्न करी
नेतागण धृतराष्ट्र बने हैं, फॅंसे हुए रंगरलियों में॥
सोचो ये ही माता है जो, अपने भाग्य संवारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

दिग्दगन्त तक भारत माँ की जय-जयकार गुंजाना है।
बीत गये स्वर्णिम अतीत को, पुन: धरा पर लाना है॥
मैं भारत हूँ, भारत का हर, सुख दु:ख मेरा अपना है,
जन जन के मन में फिर से, एकात्म भाव पनपाना है।
कोटि-कोटि कंठों से, प्यारी भारत माँ उच्चारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥

आओ भाई प्रण करलें, अपना कर्तव्य निभायेंगे।
सोकरके जो खोया है, वह स्वर्णिम युग लौटायेंगे॥
सप्तसिंधु की धारायें जो, कटकर हमसे दूर गई
सिमटी सीमा उन धाराओं, के आगे पहुँचायेगे॥
ननकाना हिंगलाज सिंध की, धरती तुम्हें पुकारती।
वन्देमातरम गाकर करलो, भारत माँ की आरती॥

भारत फिर से गौरवशाली हो, हम सबका सपना है।
ओरों को न देखो सोचो, योगदान क्या अपना है।
देशभक्ति की बातें करना, सुनलो है आसान बहुत
लेकिन इन राहों का मतलब, तलवारों पर चलना है।
कष्टों की ज्वाला मनुष्य का, भावी भाग्य सॅवारती।
वन्दे मातरम् गाकर कर लो, भारत माँ की आरती॥